Sunday, October 28, 2012

मत जलाओ दीप आज
अँधेरा रहने दो
रौशनी हमें बाँट देती है
मैं और तुम में
बना देती है  हमें
इस अमानिशा में आज
बस मानस प्रकाश ही झरने दो
 नैन दीप में तुम
 भर दो  इतना स्नेह
 करे पलायन  अंधकार
बस एक दीप ही जलने दो
अब एक दीप ही जलने दो  

Saturday, August 4, 2012

 सोचा मैंने
लिखूँ एक कविता
हरी मखमली घास पर
मगर पशुओं ने
चर ली सारी घास
फिर सोचा
घास नहीं तो
चिड़िया  पर लिखूँ
आकाश में उन्मुक्त
विचरती चिड़िया
मगर बाजों ने
नोच लिए सारे पंख
फिर फूल ,नदी ,और निर्झर
मरते रहे लगातार
अब चुने हैं मैंने
 पत्थर
लिख रही हूँ मैं
पत्थरों  पर
कविता पत्थरों की

Tuesday, June 26, 2012

पिता ! क्या हिटलरी आन थी उनकी
सारा घर घूमता था
उनके इर्द गिर्द
वे कहीं भी रहें
सब कुछ चलता रहता था
उनके अनुसार
कभी - कभी होती थी
बहुत कोफ़्त
उनकी  हिटलरी पे
बहुत बाद में जाना
पिता होने का अर्थ 
मर्यादा की डोर
पर चलते पिता
बहुत बहुत
 याद आते हैं अब